Monday, September 28, 2009

ज्ञान पर , वैभव पर साम्राज्यवादी पिपासा की विजय ...

बचपन से न जाने कितने रूपों में, कितने अलग अलग संस्करणों के चेहरे लगाए रामायण की कथा सुनते पड़ते आयें हैं....यह रामचरितमानस है , गोस्वामी तुलसीदास की लिखी हुई ...यह रामायण है ...वाल्मीकि की ...यह कंबन की ....यह दक्षिण भारतीय , और यह पश्चिम प्रांतीय ! एक कहानी , अनेको रूप, अनेको प्रस्तुतियां ...लेकिन मूल में वही एक बात ! बुराई पर अच्छाई की विजय ...आसुरी प्रवृतियों पर धर्म की संस्थापना !
वही परम्परा वही परम्परा की घिसी पिटी लकीरें !

लेकिन ना जाने क्यों ..मुझे इस कथा का निचोड़ ना तो कभी धार्मिक नज़र आया और ना ही नैतिक ! मेरे देखे रामायण की कथा विशुद्ध रूप से एक साम्राज्यवादी लोलुपता की बिसात पर खेले गए एक राजनैतिक खेल का लेखा जोखा ही है !

( जैसा की महात्मा गाँधी ने कहा था की मेरे राम , अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र राजा राम नही हैं ठीक उसी परिप्रेक्ष्य में भगवान् राम को मैं भी रामायण की कथा से अलग मान कर ही अपनी बात यहाँ रख रहा हूँ.... )

तो मैं कह रहा था की रामायण की कहानी - यदि केवल एक काल्पनिक कहानी नही है , तो निश्चय ही एक राजनैतिक घटनाक्रम है , जिसमे एक राज्य द्वारा किसी दूसरे वैभवशाली राज्य को हड़पने की साजिश साफ़ साफ़ नज़र आती है... ! आर्यों द्वारा एक संपन्न द्रविड़ राज्य पर कब्ज़ा करने की सीधी सी कहानी है यह ! आर्यों की इस साम्राज्यवादी पिपासा की गवाही तो इतिहास भी देता ही है ! एतिहासिक दस्तावेजों की कथनी आर्यों की इस प्रवृति का स्पष्ट खुलासा करती आयी है ! हर तरह के छल कपट और षड़यंत्रकारी साधनों का प्रयोग करके सत्ता हथियाना और फिर अपने साम्राज्य का विस्तार करना - इतिहास के पन्नो पर आर्यों की यह तस्वीर जगह जगह दिखाई देती है !

एक आर्यन नरेश , घर से ही किसी दूसरे राज्य को हड़पने की साजिश बना कर निकलता है ....उसे कोई बनवास नही दिया गया , बल्की उस पर एक उत्तरदायित्व है की उसे हर हाल में अपने राज्य की सीमा को विस्तार देना है ! साम दाम दंड भेद ...किसी भी युक्ति से , किसी भी छल या कूटनीति से उसे एक ऐसे राज्य को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लेने है जिसकी धन सम्पदा , वैभव की ख्याति दूर सुदूर तक फैली हुई है ! ऐसा राज्य जिसे देवता भी इर्ष्या दृष्टी से देखतें हों ....जहाँ स्वर्ण के अपार भण्डार के अलावा ज्ञान , विज्ञान और अति आधुनिक तकनीकी प्रगति का अपरिमित क्षितिज दिखायी देता हो ....कौन होगा जिसके मुंह में यह सब सुनने के बाद पानी ना आ जाए ...तो ऐसे में आर्यन वंश की आंखों में लालच उतर आता है तो इसमें अस्वाभाविक क्या है ? बस आनन फानन में एक योजना तैयारकी जाती है और फिर 'लंका-विजय' के लिए कूच कर दिया जाता है ! वैसे तो किसी भी राज्य को जीतने के लिए आक्रमण एक सीधा सा और आसान सा रास्ता है मगर यदि लक्ष्य 'लंका' जैसा समृद्ध और शक्तिशाली राज्य हो तो निश्चय ही उसे जीतने के लिए सैन्य बल नही अपितु कूटनीति का छल चाहिए ! और यही किया भी गया ! कहीं लंका के अपनों को लालच देकर, प्रलोभन देकर उन्हें गद्दार बनाया गया तो कभी अपने ही मासूम और पवित्र रिश्तों को दाँव पर लगा दिया गया ....लेकिन कहते है ना - प्यार और जंग में सब जायज़ होता है ....लक्ष्य सिद्धि कहीं अधिक महत्वपूर्ण है ! बस इसके चलते लंका पर विजय हासिल भी हो ही गयी .....! ज्ञान विज्ञान और वैभव , कूटनीति की भेंट चढ़ गया....साम्राज्यवादी लोलुपता का ग्रास बन गया !

मुझे इस सारे प्रकरण में कोई हैरानी नही है.....दुनिया है, होता है, चलता है ! हैरानी तो सिर्फ़ यही है की हम इसे कैसे अच्छाई की बुराई पर विजय मान कर दशहरा मनाते हैं ....अधर्म पर धर्म की जीत तो समझ में आती हैं लेकिन इस कहानी में अधर्म कहाँ है और धर्म कहाँ - इसे शायद मैं समझ नही पाऊंगा ! मुझे हर साल कागज़ के तीन पुतले जलते देखकर अच्छा सा महसूस नही होता ...! क्या वाकई इन पुतलों को वो नाम दिए जाने चाहिए जो इन्हे दिए गए हैं ...या फ़िर ??????????

( पुनश्च : वैसे यहाँ यह कहावत भी तो लागू होती ही है ..." जो जीता ( कैसे भी ) वही सिकंदर " नही क्या ?? )

2 comments:

अंकुर गुप्ता said...

मुझे बिल्कुल समझ नही आया कि आप कहना क्या चाहते हैं?

विक्षुब्ध सागर said...

कभी कभी कुछ बातें चाह कर भी बहुत सीधे सीधे नहीं ही पाती ....शायद इसी के चलते यह कमी रह गयी होगी ...हालाँकि मेरी सोचों में यह मुद्दा काफी स्पष्ट है....! फिर भी टिपियाने के लिए धन्यवाद ...!

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