Monday, December 1, 2008

हम किसे बदलने की बात कर रहे हैं ?

...बदल दो ! हटा दो...!
शिवराज पाटिल इस्तीफा दे ...आर आर पाटिल त्यागपत्र दे ....सी एम् को गद्दी छोड़ देनी चाहिए ...!
एक टी वी चैनल पर पूर्व पुलिस अधिकारी ज़ोर ज़ोर से कह रही थी नेतृत्व बदलना होगा !
किस नेतृत्व को बदलने की बात कर रहे हैं सब ?
रावन के कितने सर ....एक काट दो , दूसरा उग आएगा ...फ़िर तीसरा ...और फ़िर... !
एक नाग नाथ है तो दूसरा साँप नाथ ! किसी एक को हटाने से या बदल देने से आखिर हो क्या जाएगा ?
यह व्यवस्था ...यह सिस्टम या फ़िर यह माहौल बदल जाएगा क्या ? अभी तक तो नही बदला
...जाने कितने नेता आए और चले गए ...कितनी ही राजनितिक पार्टियों को हमने मौके दिए! कभी कोंई तिरंगा लेकर हमारे सर पर बैठा तो कभी कोंई अपना भगवा लेकर ...कभी किसी ने ब्रेड पेस्ट्री से लुभाया तो कभी कोंई खिचडी खिला खिला कर अपना उल्लू सीधा करता नज़र आया !
लेकिन कभी कुछ बदल पाया ?
१९४८ के कबाइली युद्ध से लेकर २००८ के मुंबई प्रहार तक...किसी ने कुछ किया ? कोंई भी आया हो या गया हो, पिछले साठ वर्षों में कश्मीर का सुलगना बंद हो सका ? कभी कोंई मन्दिर उजड़ा तो कभी कोंई मस्जिद ...कभी गुरूद्वारे खून से नहाये तो कभी चर्च तबाह किए गए ... ! कितने दंगे फसाद , कितने कहर बरपा होते रहे...कभी भी इन राजनेताओ ने कुछ किया ?

आम इंसान मरता रहा और इनकी दुकानदारी चलती रही ! चलती रही है...चलती रहेगी !

हम किसे बदलने की बात कर रहे हैं ?

लेकिन........
क्या अब हमें इसी निराशा को लिए बैठे रहना होगा ? कोंई रास्ता नही है ? क्या वाकई हम कुछ नही कर सकते ?
ना !
हमें रावन की नाभि में स्तिथ उस अमृत कुंड को तलाश कर...निशाना वहां साधना होगा !
हर युद्ध को जीतने के लिए मूल लक्ष्य भेदन बहुत ज़रूरी है ! चाणक्य की तरह जड़ में शर्करा घोल कर डालनी होगी!
बहुत हुआ beating around the bush ....! यहाँ वहां की बातें करके ख़ुद को बहलाने का सिलसिला अब यहीं रोकना होगा !

वैसे देखा जाए तो अपने आप में यह कितनी विडम्बना है की जिन्हें हम स्वयं चुन कर अपने शीर्ष पर आसीन करते हैं , उन्ही के प्रति हम ना तो कभी आस्थावान हो पाते हैं और न ही पूरी तरह आश्वस्त... ! हम में से ही उठ कर यह लोग हमारे आका बन बैठते हैं और हम अपने ही चुनाव पर सिर्फ़ शर्मिंदा हो सकते हैं या फ़िर बहुत हुआ तो इधर उधर आक्रोशित हुए घुमते फिरते हैं ! इसे निकालो..उसे हटाओ..यह पार्टी निकम्मी है वोह पार्टी सांप्रदायिक है वगेरहा वगेरहा...! दोषारोपण पलायन का सबसे सरल ...सबसे आसान रास्ता है !

मुंबई में जो कुछ भी हुआ , त्रासदायक था ...शायद अभूतपूर्व भी था ! इस तरह सरेआम दहशत कभी भी नही नाची थी ! इतने लोग इससे पहले कम से कम इस तरह कभी हलाक़ नही हुए थे ! लेकिन यहाँ याद आ रहा है उस एक बस ड्राइवर का इंटरव्यू ...कभी शायद किसी टी वी पर देखा था ! उसने कहा था ......
" जनाब यह तो पब्लिक है और पब्लिक का तो काम है मरना ... यह जो दो जंगे अजीम हुई थी उसमें कितने लाखों लोग मर गए वो मैंने मारे थे ? यह आए दिन पुल टूट जाते हैं ....बिल्डिंगे गिर जाती हैं उसमें कितने ही लोग दब के मर जाते हैं ...आप क्या समझते हैं वो क्या मैं मार रहा हूँ ? हर रोज़ ऐसे हादसों में जाने कितने लोग अपनी जान गवा देते हैं ...ऐसे में अगर दो चार बन्दे मेरी बस के नीचे आकर मर गए तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा ...बताएं ? "

तो जो कुछ भी हुआ मुंबई में ...कम से कम हमें आइना तो दिखा ही गया की हम कितने तैयार हैं ! यह जो हम बड़ी बड़ी बातें करते हैं, लम्बी लम्बी हांकते फिरते हैं .... नयूक्लेअर पॉवर बने बैठे हैं....हाल ही में चाँद पर अपना झंडा गाड़ कर गौरवान्वित हुए जा रहे हैं...क्या वाकई हम ख़ुद से नज़र मिला पाएंगे ?

ज़रा सोचें !

हम किसे बदलने की बात कर रहे हैं ? ? ?

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